दि रियल हीरो

दि रियल हीरो




By : Vageesh Mishra
Review By : Atul Chaturvedi


                                                                              मुनमुन 

         बुआ के यहाँ से एक बिलायती चूहा जब मेरे घर पहली बार आया तो उस समय वह बहुत छोटा था | उसके बाल एकदम सफ़ेद , आँखे लाल-लाल और आँखों के किनारे काले रंग का घेरा |अभी उसके पूंछ पर बाल थोड़े कम ही थे  | मेरी बुआ उस समय लेकर आई थी तब मेरी उम्र तकरीबन ग्यारह वर्ष रही होगी और मैं गर्मियों की छुट्टियों में हॉस्टल से घर आया हुआ था | बुआ हमे उसे अपने यहाँ पालने को बोल रही थी | जब मैंने उसे देखा तो वह अपना छोटा-सा मुंह खोला तो उसके नुकीले दांत दिखाई दे रहे थे यह देख मैं डर रहा था  | पास में मेरे भईया थे वह उसे बड़े प्यार से अपने हाथो में लिए उसके बालो का सहला रहे थे |

 

मेरी छोटी बहन वह भी दूर से ही देख कर मेरे जैसे डर रही थी | मैं - बुआ इसे क्या खिलाएंगे ? बुआ - देख बबुआ मेरे यहाँ तो इसको हम नरम घास की पत्तियां और चावल खिलाते है | भईया - इसको कहाँ पर रखा जायेगा बुआ | हम अभी बात ही कर रहे थे तभी मेरी अम्मा आ गयी | उनके हाथ में बेसन लगा हुआ था वह किचेन से कुछ लेने आई थी  बोली - कही रखो पर बिल्ली से बचा कर रखना है कब इसे खा जाये कोई नही जानता | जब मैं सुना तो डर गया | बुआ - तुम लोगो को कुछ करना नही है जब घर रहना हमेशा अपने पास रखना और जब स्कूल चले जाना तो पिंजरे में रख देना तुम्हारी मम्मी ख्याल रखेंगी | मैं उन लोगो की बातो को बड़े ध्यान से सुन रहा था  | मेरी बहन प्रियंका वह तो पास आने का नाम ही नही ले रही थी  | भैया उसको बुलाये और बोले - प्रियंका आओ देखो कितना प्यारा है | प्रियंका - भैया नही वह काटेगा | भैया - नही आओ न देखो मुझको नही काट रहा है | प्रियंका ने उसे पकड़ कर अपने हाथों में ले लिया और बोली -भैया कितना प्यारा है | मैं तो इसको "मुनमुन" बुलाऊंगी | "मुनमुन" कितना प्यारा नाम !!  मेरे अन्दर भी कुछ हिम्मत आयी मैंने बहन से माँगा दे दो मैं भी पकड़ना चाहता हूँ | प्रियंका - नही मैं नही दूंगी | मैं - दे दो प्लीज | प्रियंका - नही दूंगी | मैंने मुनमुन को उसको हाथो से छीन लिया | जब मेरे हाथ उसको छुए तो उसका शरीर गर्म लग रहा था उसकी बाल बहुत कोमल थे | भैया ने बुआ से बोला - बुआ ठीक है हम लोग मुनमुन को अपने घर रखेंगे |

 

           उस दिन के बाद मुनमुन हमारे घर का सदस्य बन गया था | हमारे और मुनमुन में अच्छी दोस्ती हो गयी थी जब मैं अकेला होता तो मैं मुनमुन से बाते किया करता था | वह भी मेरी बातो को समझ कर अपनी मुंह और पूंछ को हिला कर मेरी बात का समर्थन करता | उसे बस एक ही चीज से डर लगता था वह थी बिल्ली ! जब बिल्ली आती तो वह दुबक जाता था और मैं उसे अपने हाथो में लेकर उसे ऊपर उठा लेता | रात में वह हम लोगो के साथ ही सोता था और मच्छरदानी लग जाने के बाद हम लोग उसे बिस्तर पर खुला छोड़ देते थे तब वह अपना कला दिखाता था और मजा तो तब आती थी जब भैया गाना लगा देते थे तब वह कूदने लगता था | यह दृश्य देख हम तीनो भाई-बहन बहुत खुश होते थे |

 

        गर्मियों की छुट्टियां बीत चुकी थी तो मैं और मेरी बहन को नवोदय हॉस्टल में जाना था तो वह समय बहुत ही दुखदायी था मैंने मुनमुन को बड़े प्यार से सहलाया और हम दोनों हॉस्टल में आ गये और बड़े भैया गोरखपुर के हॉस्टल में | अब बस घर में तीन लोग पापा अम्मा और मुनमुन | जब हमलोग घर नही होते थे तो घर सुनसान लगता था अब पापा और अम्मा के लिए बस मुनमुन ही था जो उनसे अपने को व्यस्त रख सके | जब भी मैं हॉस्टल से फ़ोन करता तो अम्मा से मुनमुन के बारे में पूछता और अम्मा उसके पास फ़ोन लगा देती और मैं उससे बाते  करता | जवाब तो नही आता पर ऐसा अपनत्व था की मैं जान जाता की वह कैसा है |

 

          खैर जब दिवाली की छुट्टियाँ हुई तो जब मैं घर आया तो सीधे मुनमुन के पास गया  | वह हल्का-सा मोटा हो गया था और उसके पूंछ पर बाल आ गये थे | जब मैंने उससे आँखे मिलाया तो  मुझे ऐसा लग रहा था की वह मुझे भूल गया है  | शायद वह मुझसे शिकायत कर रहा था की तुम इतने दिनों से कहाँ  थे | ऐसा तो मनुष्यों के साथ भी होता है जब कोई अपना कई दिनों तक बात न करे तो लोग रूठ जाते है वैसा ही मुनमुन का हाल था | फिर भी उसने दो दिन में ही मुझको अच्छे से जान गया और फिर से हमारी और उसकी दोस्ती हो गयी थी |

 

           दिवाली का दिन था आज सारे घरो के छत पर दीप ऐसे लग रहे थे जैसे आसमान के तारे हो | उस दिन मैं बहुत खुश था पटाखे और लक्ष्मी जी की पूजा के बाद अब समय आया की मुनमुन को दीपावली का पर्व दिखाया जाए | मैं और मुनमुन गाँव के मेले में गए और आधे घंटे के बाद वापस आ गये | शाम के खाने में आज पनीर की सब्जी और कई चीजे बनी हुई थी | मैं अकेले छत पर टीवी देखकर खा रहा था मुनमुन भी मेरे पास था और वह अपने छोटी सी कटोरी में चावल खा रहा था | मैंने सोचा की मुनमुन रोज चावल ही खाता है आज तो दिवाली है क्यों न इसे पनीर का एक टुकड़ा खिलाया जाए | मैंने उसे खिलाया तो वह बड़े चाव से खाने लगा मैंने समझा इसे पसंद आ रहा है तो मैंने उसे एक और टुकड़ा खिला दिया | खाने के बाद हम सोने चले गये मच्छरदानी में आज वह ज्यादा कूद रहा था | मैंने सोचा की लग रहा है की आज ज्यादा खुश है की वह आज कुछ नया चीज खाया हुआ है | कब मुझे नींद लग गयी पता ही नही चला |

 

            सुबह जब मैं जगा तो मैंने देखा की आज मुनमुन अभी भी सोया हुआ है | जब उसे उठाया था तो उसका शरीर ठंडा और अकड़-सा गया था | किसी भी प्रकार की कोई क्रियाशीलता नही थी जैसे की कोई सजीवता न हो उसके शरीर में ; मेरा दिल धड़कने लगा सीधे मैं दौड़ता हुआ अम्मा के पास गया वह कुछ काम कर रही थी | मैं - अम्मा देखो मुनमुन को क्या हो गया है कुछ कर नही रहा है | अम्मा ने जब उसे हाथ में लिया तो उनके मुंह से अनायास ही निकल गया - हाय राम ! मैंने पूछा क्या हुआ अम्मा ? ; अम्म्मा -  बबुआ अब मुनमुन भगवान के पास चला गया | जब मैंने यह सुना तो मेरे पैरो तले जमीन खिसक गयी | मैं अपने आप को रोक नही पाया और अम्मा को पकड़ कर रोने लगा | मेरे मन यही बार-बार आ रहा था की भगवान अब मुझे कभी माफ़ नही करेगा मेरे ही

नादानी के कारण आज मुनमुन नही रहा | काश मैंने उसे पनीर नही खिलाई होती तो आज ऐसा नही होता | वह रात को दर्द से तड़प कर कूद रहा था न की उसे कोई ख़ुशी थी |

 

             इस घटना को बीते लगभग आठ वर्ष से भी अधिक हो गये हैं फिर भी मुनमुन की याद हमे आज भी आती है | हर वर्ष दिवाली के दिन मैं उसके नाम पर एक दीया अवश्य ही रखता हूँ शायद यही हमारे दोस्त मुनमुन को सच्ची श्रद्धांजलि हो |

                  SURYA PRAKASH GOND 

                          CSE 2nd year




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मुनमुन

मुनमुन


                                                                              मुनमुन 

         बुआ के यहाँ से एक बिलायती चूहा जब मेरे घर पहली बार आया तो उस समय वह बहुत छोटा था | उसके बाल एकदम सफ़ेद , आँखे लाल-लाल और आँखों के किनारे काले रंग का घेरा |अभी उसके पूंछ पर बाल थोड़े कम ही थे  | मेरी बुआ उस समय लेकर आई थी तब मेरी उम्र तकरीबन ग्यारह वर्ष रही होगी और मैं गर्मियों की छुट्टियों में हॉस्टल से घर आया हुआ था | बुआ हमे उसे अपने यहाँ पालने को बोल रही थी | जब मैंने उसे देखा तो वह अपना छोटा-सा मुंह खोला तो उसके नुकीले दांत दिखाई दे रहे थे यह देख मैं डर रहा था  | पास में मेरे भईया थे वह उसे बड़े प्यार से अपने हाथो में लिए उसके बालो का सहला रहे थे |

 

मेरी छोटी बहन वह भी दूर से ही देख कर मेरे जैसे डर रही थी | मैं - बुआ इसे क्या खिलाएंगे ? बुआ - देख बबुआ मेरे यहाँ तो इसको हम नरम घास की पत्तियां और चावल खिलाते है | भईया - इसको कहाँ पर रखा जायेगा बुआ | हम अभी बात ही कर रहे थे तभी मेरी अम्मा आ गयी | उनके हाथ में बेसन लगा हुआ था वह किचेन से कुछ लेने आई थी  बोली - कही रखो पर बिल्ली से बचा कर रखना है कब इसे खा जाये कोई नही जानता | जब मैं सुना तो डर गया | बुआ - तुम लोगो को कुछ करना नही है जब घर रहना हमेशा अपने पास रखना और जब स्कूल चले जाना तो पिंजरे में रख देना तुम्हारी मम्मी ख्याल रखेंगी | मैं उन लोगो की बातो को बड़े ध्यान से सुन रहा था  | मेरी बहन प्रियंका वह तो पास आने का नाम ही नही ले रही थी  | भैया उसको बुलाये और बोले - प्रियंका आओ देखो कितना प्यारा है | प्रियंका - भैया नही वह काटेगा | भैया - नही आओ न देखो मुझको नही काट रहा है | प्रियंका ने उसे पकड़ कर अपने हाथों में ले लिया और बोली -भैया कितना प्यारा है | मैं तो इसको "मुनमुन" बुलाऊंगी | "मुनमुन" कितना प्यारा नाम !!  मेरे अन्दर भी कुछ हिम्मत आयी मैंने बहन से माँगा दे दो मैं भी पकड़ना चाहता हूँ | प्रियंका - नही मैं नही दूंगी | मैं - दे दो प्लीज | प्रियंका - नही दूंगी | मैंने मुनमुन को उसको हाथो से छीन लिया | जब मेरे हाथ उसको छुए तो उसका शरीर गर्म लग रहा था उसकी बाल बहुत कोमल थे | भैया ने बुआ से बोला - बुआ ठीक है हम लोग मुनमुन को अपने घर रखेंगे |

 

           उस दिन के बाद मुनमुन हमारे घर का सदस्य बन गया था | हमारे और मुनमुन में अच्छी दोस्ती हो गयी थी जब मैं अकेला होता तो मैं मुनमुन से बाते किया करता था | वह भी मेरी बातो को समझ कर अपनी मुंह और पूंछ को हिला कर मेरी बात का समर्थन करता | उसे बस एक ही चीज से डर लगता था वह थी बिल्ली ! जब बिल्ली आती तो वह दुबक जाता था और मैं उसे अपने हाथो में लेकर उसे ऊपर उठा लेता | रात में वह हम लोगो के साथ ही सोता था और मच्छरदानी लग जाने के बाद हम लोग उसे बिस्तर पर खुला छोड़ देते थे तब वह अपना कला दिखाता था और मजा तो तब आती थी जब भैया गाना लगा देते थे तब वह कूदने लगता था | यह दृश्य देख हम तीनो भाई-बहन बहुत खुश होते थे |

 

        गर्मियों की छुट्टियां बीत चुकी थी तो मैं और मेरी बहन को नवोदय हॉस्टल में जाना था तो वह समय बहुत ही दुखदायी था मैंने मुनमुन को बड़े प्यार से सहलाया और हम दोनों हॉस्टल में आ गये और बड़े भैया गोरखपुर के हॉस्टल में | अब बस घर में तीन लोग पापा अम्मा और मुनमुन | जब हमलोग घर नही होते थे तो घर सुनसान लगता था अब पापा और अम्मा के लिए बस मुनमुन ही था जो उनसे अपने को व्यस्त रख सके | जब भी मैं हॉस्टल से फ़ोन करता तो अम्मा से मुनमुन के बारे में पूछता और अम्मा उसके पास फ़ोन लगा देती और मैं उससे बाते  करता | जवाब तो नही आता पर ऐसा अपनत्व था की मैं जान जाता की वह कैसा है |

 

          खैर जब दिवाली की छुट्टियाँ हुई तो जब मैं घर आया तो सीधे मुनमुन के पास गया  | वह हल्का-सा मोटा हो गया था और उसके पूंछ पर बाल आ गये थे | जब मैंने उससे आँखे मिलाया तो  मुझे ऐसा लग रहा था की वह मुझे भूल गया है  | शायद वह मुझसे शिकायत कर रहा था की तुम इतने दिनों से कहाँ  थे | ऐसा तो मनुष्यों के साथ भी होता है जब कोई अपना कई दिनों तक बात न करे तो लोग रूठ जाते है वैसा ही मुनमुन का हाल था | फिर भी उसने दो दिन में ही मुझको अच्छे से जान गया और फिर से हमारी और उसकी दोस्ती हो गयी थी |

 

           दिवाली का दिन था आज सारे घरो के छत पर दीप ऐसे लग रहे थे जैसे आसमान के तारे हो | उस दिन मैं बहुत खुश था पटाखे और लक्ष्मी जी की पूजा के बाद अब समय आया की मुनमुन को दीपावली का पर्व दिखाया जाए | मैं और मुनमुन गाँव के मेले में गए और आधे घंटे के बाद वापस आ गये | शाम के खाने में आज पनीर की सब्जी और कई चीजे बनी हुई थी | मैं अकेले छत पर टीवी देखकर खा रहा था मुनमुन भी मेरे पास था और वह अपने छोटी सी कटोरी में चावल खा रहा था | मैंने सोचा की मुनमुन रोज चावल ही खाता है आज तो दिवाली है क्यों न इसे पनीर का एक टुकड़ा खिलाया जाए | मैंने उसे खिलाया तो वह बड़े चाव से खाने लगा मैंने समझा इसे पसंद आ रहा है तो मैंने उसे एक और टुकड़ा खिला दिया | खाने के बाद हम सोने चले गये मच्छरदानी में आज वह ज्यादा कूद रहा था | मैंने सोचा की लग रहा है की आज ज्यादा खुश है की वह आज कुछ नया चीज खाया हुआ है | कब मुझे नींद लग गयी पता ही नही चला |

 

            सुबह जब मैं जगा तो मैंने देखा की आज मुनमुन अभी भी सोया हुआ है | जब उसे उठाया था तो उसका शरीर ठंडा और अकड़-सा गया था | किसी भी प्रकार की कोई क्रियाशीलता नही थी जैसे की कोई सजीवता न हो उसके शरीर में ; मेरा दिल धड़कने लगा सीधे मैं दौड़ता हुआ अम्मा के पास गया वह कुछ काम कर रही थी | मैं - अम्मा देखो मुनमुन को क्या हो गया है कुछ कर नही रहा है | अम्मा ने जब उसे हाथ में लिया तो उनके मुंह से अनायास ही निकल गया - हाय राम ! मैंने पूछा क्या हुआ अम्मा ? ; अम्म्मा -  बबुआ अब मुनमुन भगवान के पास चला गया | जब मैंने यह सुना तो मेरे पैरो तले जमीन खिसक गयी | मैं अपने आप को रोक नही पाया और अम्मा को पकड़ कर रोने लगा | मेरे मन यही बार-बार आ रहा था की भगवान अब मुझे कभी माफ़ नही करेगा मेरे ही

नादानी के कारण आज मुनमुन नही रहा | काश मैंने उसे पनीर नही खिलाई होती तो आज ऐसा नही होता | वह रात को दर्द से तड़प कर कूद रहा था न की उसे कोई ख़ुशी थी |

 

             इस घटना को बीते लगभग आठ वर्ष से भी अधिक हो गये हैं फिर भी मुनमुन की याद हमे आज भी आती है | हर वर्ष दिवाली के दिन मैं उसके नाम पर एक दीया अवश्य ही रखता हूँ शायद यही हमारे दोस्त मुनमुन को सच्ची श्रद्धांजलि हो |

                  SURYA PRAKASH GOND 

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